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2 अक्टू॰ 2019
1 अक्टू॰ 2019
बूढ़े और मोबाइल.. डॉ .ओ.पी .व्यास (एक चुटीली हास्य व्यंग्य रचना)
बूढ़े और मोबाइल?
एक चुटीली हास्य, व्यंग्य रचना -डॉ,. ओ . पी .व्यास
पुर्व समय में हम प्रात: करते थे -
"प्रातः काल उठ कर, रघुनाथा| मात, पिता, गुरु नावहिं माथा ||" [राम चरित मानस]
"प्रातः काल उठ कर, रघुनाथा| मात, पिता, गुरु नावहिं माथा ||" [राम चरित मानस]
इसीलिए सब कट गये, कट गई, दुनिया पूरी ||
पहले नानी कहानी, बच्चों से कहती थी।
नाना, नानी बच्चों के, सदा पास रहती थी ||
अब नानी की कहानी, कौन सुनाए हमको?
कितनी थी मिठास किस्सों में कौन बताए हमको? ||
दादा के अनुभव की बातें, और दादी जी के नुस्खे |
बताएगा बच्चों को सब दिमाग़ से खिसके ?
इसमें एक बड़ा कारण है, वह है एक मोबाइल |
सब का मुंह सूजा सूजा सा, गर्म और है बॉईल || [उबलता हुआ]
27 अक्टू॰ 2018
ज़िन्दे में तो देते नहीं हैं माता पिता को खाने --
मरने के बाद पीछे, पीछे , फेंकत चले मखाने || डॉ.ओ.पी.व्यास
हमने ख़ूब करी थी सेवा, मेवा दीं थीं खाने ||
उस मेवा से ही तो बच गये, अब फेंकें वही मखाने ||
धन दौलत जो ख़ूब छोड़, गये हम बच्चों के लाने |
हमें ना कोई चाह है धन की,ये हम को बे माने ।।
फ़ैंक रहे ये दस्सो, पंजो, हम इनको क्या जानें ।।
एक एक बूँद जल को तरसे, अब चले, गया श्राद्ध ,कर वाने ।
(सो फेंकें उसके लाने ||) ( निर्धन के लाने ||) [ 434 ]
29 दिस॰ 2017
नो दिन भैय्या खूब मनाई हमने नो दुर्गा-- दसवें दिन दारू को पी के --- |..डॉ.ओ.पी. व्यास
एक हास्य व्यंग्य- शिक्षा प्रद कविता ..
नोट ...यह रचना एक बहुत अच्छी रचना है ब्रह्मा कुमारी आश्रम ज्ञान मुरली पर आधारित है - बी. के . डॉ. ओ.पी. व्यास .
नो दिन भैय्या खूब मनाई , हमने नो दुर्गा |
दसवें दिन दारु को पीकर ,काटे सो मुर्गा ||
[ 1 ]
किया जागरण माताजी का ,
रात रात भर जागे |
22 अग॰ 2017
25 नव॰ 2016
काले धन का गंगा स्नान .हें काले धन, आपको, शुद्ध कर रहे मोदी ? -हास्य व्यंग्य -डॉ.ओ.पी.व्यास
हास्य व्यंग्य कविता [डॉ'ओ.पी.व्यास ]
[विशेष कविता ...काले धन का गंगा स्नान हेमाद्री संकल्प पाप उतारने के लिए ]
हे, काले धन, आपको, शुद्ध कर रहे, मोदी |
नहला रहे हैं, धो रहे हैं, जो बुद्धि हुई थी औंधी ||
कूट रहे हैं, पीट रहे हैं, गंगा जी में डाल रहे हैं |
अच्छी तरह खंगाल रहे हैं, मैल चढ़ा जो, निकाल रहे हैं ||
हेमाद्री, स्नान, करा कर, पञ्च गव्य, पंचामृत को पिला कर |
सारे तीर्थों में नहला कर, सप्त सिंधु और सभी सरोवर,
छोटी बड़ी सभी नदियों में, कूप कुण्ड, और पोखर में,

छोटी-बड़ी हैं जो भी , हौदी |
हे, काले धन, आपको, शुद्ध कर रहे मोदी ||
नहला रहे हैं, धो रहे हैं, जो बुद्धि हुई थी औंधी ||
इन सब जल से, खूब मल मल के, निकाल के मल को |
फिर शुद्ध वस्त्र में, हो खूब चकाचक,आना देश में कल को ||
अब निखरेगा, खार उतरेगा, स्वर्ण चमकेगा, तप के आग में |
नया देवता ,अब प्रकटेगा, आयेगी दम देश राग में ||
जैंसे बालक, जब है नहाता, रोता है, कितना चिल्लाता|
माता उसको ,दुश्मन लगती, माँ की महिमा जान ना पाता ||
मगर, बाद में, पूरी उम्र भर, माता के गुण गाता रहता|
माँ अच्छी है, माँ देवी है, माता की स्तुति ,वह करता ||
फिर ,बाद में तन कर, अफसर बन कर, कहता फिरता, माँ ने मेरी बुद्धि शोधी |
बस वैंसे ही सब प्रतिरोधी, बोलेंगे ,बाद में मोदी, मोदी, मोदी, मोदी ||
[ डॉ.ओ.पी.व्यास 25 / 11 / 2016 शनिवार]
1 जुल॰ 2016
तुम्हारी नज़र में जो है कबाड़ा| हमारी नज़र में परिश्रम है गाढ़ा||
कबाड़ा
पत्नी कहतीं है घर में बेजरूरत कवाड (पुराना फर्नीचर, कताबें, लकड़ी, प्लास्टिक आदि सजावटी टूटा-फूटा सामान) एकत्र हो गया है, पर हमारी सोच कुछ अलग है-देखें-
तुम्हारी नज़र में जो है कबाड़ा|
हमारी नज़र में परिश्रम है गाढ़ा||
[ 1 ]
उसमें हमारे स्वेद [पसीने ] की ही महक है,
उसमें हमारे रक्त की ही चहक है||
उसमें हमारी यादें बसी हैं|
उसमें हमारे कई दिन हसीं
हैं||
जब तुम थीं एक लाड़ी|
और हम थे
एक लाड़ा||
तुम्हारी नज़र में जो है कबाड़ा|
हमारी नज़र में परिश्रम है
गाढा||
[ २ ]
आईं थीं तुम चन्द्र मुखी, शर्मातीं|
सभी के
दिलों को छूतीं और भातीं|
पर कब वक्त ने करबटें बदल लीं|
उन
सुनहरे दिनों ने आगे टहल की||
कब वक्त के सूरज के ताप ने,
तुम
सूरजमुखी हुईं, और
ज्वालामुखी हुईं||
शीतल जो चांदनी थी,
वो लावा मुखी हुई,
शान्त
जीवन हमारा कब बन गया एक अखाड़ा||
तुम्हारी नज़र में जो है कबाड़ा|
हमारी
नज़र में परिश्रम है गाढा||
[ ३ ]
हो गये दिन हवा जब पसीना इत्र था|
अब इत्र
भी लगे दुशमन जो कभी मित्र था||
अच्छे भले रिश्ते का क्यों दूध फाड़ा|
तुम्हारी
नज़र में जो है कबाड़ा|
हमारी नज़र में परिश्रम है गाढ़ा||
अरे लड़ने
को तो ओलम्पिक ही बहुत है|
कहते हैं खेल भावना जहां पर रहत है|
कहते हैं खेल से ही बनती
सेहत है||
करते सेहत के लिए कितनी मेहनत हैं|
तो फिर घरों को क्यों बनाओ
अखाड़ा|
तुम्हारी नज़र में जो है कबाड़ा|
हमारी नज़र में परिश्रम है गाढ़ा||
00000000000000000000000000000२९/६/२०१६ बुधवार000000000000000000000000000
5 जन॰ 2015
23 नव॰ 2014
मिशन स्वछता ....हास्य व्यंग्य कविता ...डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.
हास्य व्यंग्य कविता डॉ. ओ. पी. व्यास गुना म.प्र .
मिशन स्वच्छता
सेठानी ने मुबारक पर फेंकी ऊपर से [ बासी] दाल ||
पड़ी मुबारक के ऊपर बिगड़े कपड़े साफ़ ||
सेठानी घबरा गई , बोली करना माफ़ ||
भैया दाल बासी नहीं, अभी बनी है ताजी |
17 नव॰ 2014
फुलझड़ियाँ
मेरे द्वारा समय समय पर लिखी गयीं विभिन्न कविताओं के अंश
फुलझड़ियाँ
भजन करो तुम जम के प्यारे जम के दूत ठाडे हैं द्वारे
कोई काम ना जब आएगा,भजन ही आयेंगे काम तिहारे।
**
नों दिन भैय्या खूब मनाई तुमने नोदुर्गा,
दसवें दिन दारू को पीकर काटे सॉ मुर्गा।.
**
जिन्दे में तो देते नहीं हैं ,माता पिता को खाने .
मरने के बाद पीछे पीछे फेंकत चले मखाने।
**
ओ मोरे गाँधी बब्बा, ओ मोरे गाँधी बब्बा .
आ कर देश बचालो भारत ,गोल हो रहा डब्बा
**
स्वीकारें मेरा सलाम जी, आये वहां से जहां गये राम जी ,
देश ने वैंसे लिया जम्प जी, सचिन तेदुलकर ने उखाड़े स्टम्प जी ,
पर ले कर कुछ नेता पम्प जी, कर रहे हैं बहुतही हडकम्प जी,
करें देश को ये बदनाम जी, एपीजे अब्दुल कलाम जी
ऐंसी कोई बनाओ मिसाइल बोएं बबूल और निकलें आम जी ,
एपीजे अब्दुल कलाम जी , स्वीकारें मेरा सलाम जी।
***
11 अग॰ 2014
क्या करें दुनिया है पूरी दोगली ...हास्य व्यंग्य कविता ...डॉ.ओ.पी. व्यास
क्या करें दुनिया है पूरी दोगली,
क्या करें दुनिया है पूरी दोगली।
हम चाह कर भी छोड़ते ना वो गली,
हम आदि मानव थे, ना मानव बन सके।
छोड़ कर जाता नहीं वो मोगली।
हम अपनों से ही कर रहे हैं हरकतें,
मारते रहते हैं उन पर गोगली।
पूँछ कुत्ते की ना सीधी हो सकी ,
कोशिशें कर के है हारी पोंगली ..
पूँछ कुत्ते की ना सीधी हो सकी ,
कोशिशें कर के है हारी पोंगली ..
वहीं फ़ितरत ‘’ व्यास ‘’ ले जाती हमें,
कसमें खा कर छोड़ देते जो गली।
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
लड़का है इंदौर हमारा ...हास्य कविता ...डॉ.ओ.पी.व्यास
हास्य कविता ....[डॉ.ओ.पी.व्यास ]
कनाड़ा जाने से पूर्व ...
कनाड़ा जाने से पूर्व ...
लड़का है इंदौर हमारा, लड़की रहे कनाड़ा है.।
जाना कैसे होवे सम्भव, लगे बहुत सा भाड़ा है॥
लड़का है इंदौर हमारा, लड़की रहे कनाड़ा है।
जाना कैसे होवे सम्भव, लगे बहुत सा भाड़ा है ॥
भारत में गरमी पडती है, वहां बहुत ही जाड़ा है।
क़दम क़दम पर खतरा खतरा, बंधा हुआ यम पाड़ा है॥
अब तो जाना लगभग तय है, बांध लिया अब नाडा है।
वहां पर नॉन वेज मिलता है, यहाँ पर वेज सिंघाड़ा है।
वहां जिन्हें ब्राइड ग्रूम कहें हैं, यहाँ वो लाड़ी लाड़ा है॥
वहां पर जिम हैं हेल्थ बनाने, यहाँ मलखम्भ अखाडा है।
यहाँ पर है बंगाल की खाड़ी, वहां हडसन का खाड़ा है॥
वहां पर पीने को हर किस्मी, यहाँ तुलसी का काढ़ा है।
होगा दूध वहां पर गाढ़ा, पर प्रेम यहाँ पर गाढा है ॥
वहां पर गोरी भूरी मेमें, यहाँ पर रानी हाड़ा है।
पर अब समय आया जाने का, बजने लगा नगाड़ा है ॥
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[डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.]
5 अग॰ 2014
19 जुल॰ 2014
जलेबी और कुण्डली...हास्य कुण्डली...डॉ.ओ.पी.व्यास
हास्य कुण्डली
जलेबी और कुण्डली
[डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.]
जलेबी और कुण्डली
[डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.]
जलेबी और कुण्डली , में नहीं है कुछ भी फर्क।
दोनों में ही होती मिठास , और प्रेम का अर्क ॥
और प्रेम का अर्क ,दोंनों हैं ,राउंड ,राउंड स्टॉप ।
एक जीभ से ,एक कान से, देती स्वाद है टॉप॥
कह कवि ओ.पी.व्यास ,मगर रोगी और ऐबी ।
उनको कड़वी लगे, कुण्डली ,और जलेबी॥
०००००००००००००००००००००००००००००
19/7/2014 शनिवार
०००००००००००००००००००००००००००००
4 जुल॰ 2014
काला धन या काला घन ?
कुंडली [ डॉ.ओ. पी. व्यास ,गुना म.प्र .]
काले धन [ Black Money ] से अधिक है ,
उसमें से ही निकलती अच्छे दिन की राह॥.
अच्छे दिन की राह, होय जब अच्छी वर्षा।
हर प्राणी का मन ,रहता तब हर्षा , हर्षा ॥
कह कवि ओ .पी .व्यास , चाह रखो काले घन से।
काम चलेगा नहीं , तुम्हारा , काले धन से ॥
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००26 फ़र॰ 2014
वेलेंटाइन ...हास्य व्यंग्य रचना ...डॉ.ओ.पी .व्यास गुना म.प्र.
वेलेंटाइन
वेल एन की टाई जहां है अजी वो है वेलेंटाइन ।
इसमें बुरा कहाँ है भैया सब कुछ तो है फाइन ॥
सब कुछ तो है फाइन जो किया लैला मजनूँ ।
या शीरी फरहाद या हीर राँझा नूँ ॥
काम देव रति ने किया जिस लव बुक पर साइन ।
उस ही बुक में लिखा हुआ है शब्द ये वेलेंटाइन ॥
डॉ , ओ.पी .व्यास गुना म.प्र.
वेल एन की टाई जहां है अजी वो है वेलेंटाइन ।
इसमें बुरा कहाँ है भैया सब कुछ तो है फाइन ॥
सब कुछ तो है फाइन जो किया लैला मजनूँ ।
या शीरी फरहाद या हीर राँझा नूँ ॥
काम देव रति ने किया जिस लव बुक पर साइन ।
उस ही बुक में लिखा हुआ है शब्द ये वेलेंटाइन ॥
डॉ , ओ.पी .व्यास गुना म.प्र.
22 जन॰ 2014
कुछ कविताओं की ध्रुव पंक्तियाँ
डॉ .ओ .पी .व्यास ...गुना म .प्र. की कुछ कविताओं की ध्रुव पंक्तियाँ .....
दसवें दिन दारू को पी के काटे सों मुरगा ॥
................................................................
ज़िंदे में तो देते नहीं हें माता पिता को खाने ।
मरने के बाद पीछे , पीछे फेंकत चले पीछे पीछे मखाने ॥
..........................................................................................................
पत्नी जी के लिए पति हैं मात्र एक बस घोड़ा ।
15 जन॰ 2014
हास्य व्यंग्य कविता .....बाबाजू ओ बाबाजू ......डॉ . ओ .पी .व्यास
हास्य व्यंग्य कविता .....बाबाजू ....
बाबा जू ओ बाबा जू
आप तो आ रहे जा बाजू ।
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