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12 मई 2019
22 अप्रैल 2018
( 419 .. 1 ) रे मूढ़ , मनुज तू यौवन के मद में क्यों -- भर्तृहरि .[ 419 ] [ 99..२ ].----..डॉ.ओ.पी.व्यास
(419 ) ( 99 .2 ) रे मूढ़ मनुज तू यौवन के , मद में क्यों इतना ग़ाफ़िल है |
भौतिक साधन की प्राप्ति हेतु , फिर रहा बना तू पागल है ||
यह यौवन क्षण भंगुर मानव , बुल बुला है पानी का जैसे |
सारी विभूतियाँ अस्थिर हैं , तूने स्थिर मानी कैंसे ||
तू बैठा है यम डाढ बीच ,ना जाने कब चब जाएगा |
इस काल बली की डाढ़ों से , तेरा ना चिन्ह बच पाएगा ||
तू समझ रहा है इस सबको ,परलोक की पर कोई फ़िक्र नहीं |
तेरी जबान पर रे मूरख , क्यों शिव के नाम का जिक्र नहीं ||
भर्तृहरि .[ 419 ] [ 99..२ ].डॉ.ओ.पी.व्यास
11. 6. 1997 ......................................................................................................................................
17 मार्च 2017
प्राक्कथन भर्तृहरि शतक [काव्यानुवाद|] ...डॉ.ओ.पी..व्यास गुना म.प्र.
भर्तृहरि
शतक [काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी.व्यास]
प्राक्कथन
[भाग 1]
धन्य
धन्य नगरी अवंतिका[1]
जहां हुए भर्तृहरि महाराज |
परम
दयालु ,
प्रजा वत्सल, योग शिरोमणि, योगी राज||
21 जन॰ 2017
भर्तृहरि नीति शतक काव्यानुवाद (सम्पूर्ण)
भर्तृहरि नीति शतक काव्यानुवाद
डॉ.ओ.पी.व्यास (गुना मप्र),
प्राक्कलन
उज्जैन
के आदिकालीन शासक राजा भरथरी (भर्तृहरि) जिन्हें बाद में वैराग्य हो गया
था, ने संस्कृत साहित्य के माध्यम से शतक-त्रय लिखकर समाज को अनमोल ज्ञान,
शिक्षाएं दी हें, प्रचलित मान्यताओं के अनुसार राजा भर्तृहरि महाराजा विक्रमादित्य
के बाद अनुमानित: इसा के 550 वर्ष पूर्व उज्जैन के शासक रहे थे| बाद में उन्होंने गुरु गोरखनाथ से दीक्षा लेकर सन्यास ग्रहण कर लिया था|
उनके द्वारा लिखित संस्कृत साहित्य समाज को उनकी अनमोल शिक्षा है|
देखें विडियो इसमें इस काव्य का परिचय मिलेगा|
देखें विडियो इसमें इस काव्य का परिचय मिलेगा|
4 जन॰ 2017
[ 109 ]पुरुष होंय गम्भीर कभी भी खोते नहीं हैं धीरज | चाहे कष्ट कोई भी होवे ,करते नहीं हैं अचरज ||
भर्तृहरि
नीति शतक श्लोक क्र.[ 109 ]
काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी.व्यास
काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी.व्यास
पुरुष
होंय गम्भीर, कभी भी, खोते नहीं हैं
धीरज|
चाहे कष्ट कोई भी होवे, करते नहीं हैं अचरज||
जैंसे अग्नि की ज्वाला को, कर दें भले ही नीची|
मगर धीर पुरुष के जैंसी, जाती हर दम ऊंची|| [ 109 ]
चाहे कष्ट कोई भी होवे, करते नहीं हैं अचरज||
जैंसे अग्नि की ज्वाला को, कर दें भले ही नीची|
मगर धीर पुरुष के जैंसी, जाती हर दम ऊंची|| [ 109 ]
[ 108 ] एक शूर पुरुष , सूरज जैसा ,पदा क्रान्त पृथ्वी करता | वश कर लेता अखिल विश्व ,जन जन में सुख को करता ||
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक
क्र.[ 108 ]
काव्यानुवाद ..डॉ.ओ.पी.व्यास
एक शूर पुरुष सूरज जैसा, पदाक्रान्त पृथ्वी करता|
काव्यानुवाद ..डॉ.ओ.पी.व्यास
एक शूर पुरुष सूरज जैसा, पदाक्रान्त पृथ्वी करता|
वश कर लेता अखिल विश्व,
जन जन में सुख को भरता||
जैसे की भास्कर किरणों से, जग में प्रकाश फैलाता है |
जैसे की भास्कर किरणों से, जग में प्रकाश फैलाता है |
देकर कण कण को वह जीवन,
सबके मन को हर्षाता है||[ 108 ]
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[ 107 ] जिसके तन में प्रिय शील रहे , वह अखिल विश्व को अति प्रिय है
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र.[ 107 ] काव्यानुवाद ...
जिसके तन में प्रिय शील
रहे, वह अखिल विश्व को अति प्रिय है|
वह महा भयंकर अग्नि उसे, शीतल
जल जैसी निश्चय है||
उसे महासिंधु है क्षुद्र नदी, और है सुमेरु सादा पत्थर|
हैं सिंह उसे मृग के जैसे, पुष्पों की माला हैं विषधर||
औरों के लिए जो विष वर्षा, वह उसके लिए सुधामय है |
जिसके तन में प्रिय शील रहे, वह अखिल विश्व को अति प्रिय है|| [ 107 ]
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3 जन॰ 2017
[ 106 ] अप्रिय बोलने में निर्धन जो , प्रिय , वक्ताओं में धनवान | स्वयं की पत्नी से जो अति ख़ुश ,पर निंदा पर दें ना ध्यान ||
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र.[ 106 ] काव्यानुवाद ....डॉ.ओ.पी.व्यास
अप्रिय बोलने में निर्धन जो, प्रिय,
वक्ताओं में, धनवान|
स्वयं की पत्नी से जो अति ख़ुश, पर
निंदा पर दें ना ध्यान||
पर पीडन से दूर रहें जो, पुरुषों में
शोभा वाले|
कभी कभी पड़ते हैं दिखाई, कान्ति और आभा
वाले|| [ 106]
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[ 105 ] मालती के पुष्प जैंसे , पुरुष होते हैं मनस्वी |दो ही गतियां पांय हैं , पांय दो ही पदवी ||
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र, 105 काव्यानुवाद ,,,डॉ,ओ,पी,व्यास
105
मालती के पुष्प जैसे, पुरुष होते हैं मनस्वी|
दो ही गतियाँ पांय वे, हों दो ही पदवी||
या तो श्रेष्ठ मुकुट वत होते, सर्व लोक में|
या तप से तन त्याग, जाएँ, वे स्वर्ग लोक में||
मालती के पुष्प जैसे, पुरुष होते हैं मनस्वी|
दो ही गतियाँ पांय वे, हों दो ही पदवी||
या तो श्रेष्ठ मुकुट वत होते, सर्व लोक में|
या तप से तन त्याग, जाएँ, वे स्वर्ग लोक में||
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25 दिस॰ 2016
[ 104 ] लाभ कौन से जगत में , आये आपके हाथ | यदि तुमने काटा समय , नहीं गुणवान के साथ ||////
लाभ
कौन से जगत में आये आपके हाथ|
यदि
तुमने काटा समय नहीं गुणवान के साथ||
और
असुखकर दुःख तुम हो, क्या क्या ढोते आये?
मूर्ख
प्राज्ञेतरों संग, जो, इतने दिवस बिताये||
रोज
रोज ही व्यर्थ की हानि रहे उठाते|
मूल्य
वान कर समय नष्ट, अब आंसू बैठ बहाते||
क्यों
नहीं प्राप्त निपुणता करते, धर्म तत्व को सीख|
व्यर्थ
ही याचक बन कर मांगो, पूर्ण विश्व से भीख||
उठो,
बनो अब शूर जीत कर, अपनी इन्द्रिय काम|
कौन तुम्हारी
प्रियतमा हो, पतिव्रता हो वाम||
असली
धन क्या? है इस जग में, बस केवल
एक विद्या|
कहीं
भटकना कभी पड़े ना, इससे बड़ा है सुख क्या? [ 104 ]
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.[ 103 ]...बहुत किए हों जिनने पूर्व जन्म में पूण्य | नगर बनें उनको जंगल भी , पुरुष हैं ऐसे धन्य ||...
बहुत किए हों जिनने पूर्व
जन्म में पुण्य|
नगर बनें उनको जंगल भी, पुरुष हैं ऐसे धन्य||
और वहीं जंगल में उनकी राजधानी हो जाती|
वहां नागरिक सज्जन होते, बढ़ती बहुत है ख्याति||
धन रत्नों से वसुधा भरती, विपुल सम्पदा आती|
प्रजा वहां की सुख से रहती, राजा का गुण गाती ||
[ 103 ]
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20 दिस॰ 2016
[ 102 ] होनी ही होती है हरदम अनहोनी कभी नहीं होती | उठ भाग्य भाग्य कहने वाले क्यों सूरत ले बैठा रोती || डॉ.ओ.पी.व्यास
भर्तृहरि नीति शतक[ 102 ]
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य, भाग्य कहने वाले, क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ 1 ]
चाहे चढ़ जाओ सुमेरू पर, चाहे तो सिंधु में कूद पड़ो,
मत डरो कि जो भी कूदा है, लाता अमूल्य वह है मोती||
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले,क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ २ ]
उठ रण कर शत्रु से क्यों डरता, मरने से डरता वह मरता,
जब काल तेरा आ जाएगा, बुझना तो है एक दिन ज्योती||
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले , क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ 3 ]
वाणिज्य करो, कृषि कार्य करो, सम्पूर्ण कलाओं को सीखो,
क़िस्मत तो हरदम जाग्रत है, किसने है, कहा वह है सोती||
होनी ही होती है, हरदम अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले क्यों सूरत ले बैठा रोती ||
[ 4 ]
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य, भाग्य कहने वाले, क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ 1 ]
चाहे चढ़ जाओ सुमेरू पर, चाहे तो सिंधु में कूद पड़ो,
मत डरो कि जो भी कूदा है, लाता अमूल्य वह है मोती||
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले,क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ २ ]
उठ रण कर शत्रु से क्यों डरता, मरने से डरता वह मरता,
जब काल तेरा आ जाएगा, बुझना तो है एक दिन ज्योती||
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले , क्यों सूरत ले बैठा रोती||
[ 3 ]
वाणिज्य करो, कृषि कार्य करो, सम्पूर्ण कलाओं को सीखो,
क़िस्मत तो हरदम जाग्रत है, किसने है, कहा वह है सोती||
होनी ही होती है, हरदम अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भाग्य भाग्य कहने वाले क्यों सूरत ले बैठा रोती ||
[ 4 ]
उठ जाग कि पंखों को फैला, उठ दूर गगन में तू उड़ जा,
जब कर्म की रेखा सोती है, तो धन की रेखा भी सोती|
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भग्य भाग्य कहने वाले, क्यों सूरत ले बैठा रोती||
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र [ 102 ]
काव्यानुवाद डॉ.ओ.पी.व्यास
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जब कर्म की रेखा सोती है, तो धन की रेखा भी सोती|
होनी ही होती है हरदम, अनहोनी कभी नहीं होती|
उठ भग्य भाग्य कहने वाले, क्यों सूरत ले बैठा रोती||
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र [ 102 ]
काव्यानुवाद डॉ.ओ.पी.व्यास
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[101 ] हें मन्द भाग्य , यह कर्म भूमि है ,तुमने जहाँ है जन्म लिया | क्यों नहीं सत्कर्मों को करते , क्यों नहीं करो तपश्चर्या || काव्यानुवाद डॉ.ओ.पी.व्यास
[
101 ]
हें
मन्द भाग्य,
यह कर्म भूमि है, तुमने जहां है जन्म लिया|
क्यों
नहीं सत्कर्मों को करते?,
क्यों नहीं करो, तपश्चर्या?
मूल्य
वान ले स्वर्ण पात्र को,
मणि, वैदूर्य से कर सज्जित|
चन्दन
काष्ठ को जला जला,
तिल सेंक करो हो तुम संचित||
स्वर्ण
का हल निर्माण करा,
जोत रहे भूमि किंचित|
मेंढ़
कपूर को काट बनाते, मूर्ख शिरोमणि तुम समुचित||
हाय
वृथा ही जन्म लियो,
ना कर्म कियो, ना हरि नाम लियो||
धिक्कार
तुम्हें,
हें भार स्वरूप, इतने दिन धरती पे, काहे जियो|| [ 101 ]
28 नव॰ 2016
[100 ]...अच्छा बुरा कर्म जो भी हो ,प्रथम विचार करो विद्वान् | भली भांति परिक्षण कर लो , गुण दोषों को लीजिए जान ||...
भर्तृहरि नीति शतक श्लोक क्र.[ 100 ]
काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी.व्यास
अच्छा बुरा कर्म जो भी हो, प्रथम विचार करो विद्वान् |
भली भांति परिक्षण कर लो, गुण दोषों को लीजिए जान ||
बिना विचारे जो भी करते, जल्द बाजी में जो कर्म |
मृत्यु पर्यन्त वे चुभें वाण से, बिंध जाता है उर का मर्म ||
[100 ]
................................................................................
[ 99 ] ..हें साधो सत्कर्म करो तुम , सत्क्रिया भगवती ही ध्याओ | व्यर्थ करो मत श्रम अन्यों में ,सत्कर्मों में ही मन लाओ ||...
[ 99 ]...
भर्तृहरि नीति शतक
काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी.व्यास
हें साधो सत्कर्म करो तुम, सत्क्रिया भगवती ही ध्याओ |
व्यर्थ करो मत श्रम अन्यों में, सत्कर्मों में ही मन लाओ ||
सत्कर्म से सज्जन, बनें, दुष्ट, मूर्ख, बनें, विद्वान् |
शत्रु, मित्र, सत्कर्म से होते, हों परोक्ष, प्रत्यक्ष, समान ||
विष भी सत्कर्मों के कारण, हों जाता है अमृत वान |
इसीलिए सत्कर्म ही पूजो, यही देव, भगवती, महान ||
[ 99 ]
..............................................................................
[ 98 ] ...वन में रण में शत्रु मध्य में ,जल में और अग्नि में तप्त | महासिंधु में ,महान गिरि पर ,असावधान हों , होंय प्रसुप्त ||...
भर्तृहरि नीति शतक ..श्लोक क्र.[ 98 ]...
काव्यानुवाद ..डॉ.ओ.पी.व्यास
वन में, रण में,शत्रु मध्य में, जल में और अग्नि में तप्त |
महा सिंधु में ,महान गिरि पर, असावधान हों, होंय प्रसुप्त||
संकट काल कहीं हो कैंसा, रक्षा करें हमारे कर्म|
पूर्व जन्म में कर्म किये शुभ, विद्वद जन यह समझें मर्म|| [ 98 ]
.........................................................................
[97 ]आकृति से फल होय नहीं ,ना कुल , शील से होय |विद्या , भाव ,स्वभाव और सेवा ,वृथा,व्यर्थ सब कोय ||...
भर्तृहरि नीति शतक - श्लोक क्र.[97 ]
आकृति से फल होय नहीं, ना कुल, शील से होय|
विद्या, भाव, स्वभाव और सेवा, वृथा, व्यर्थ सब कोय||
पूर्व जन्म कृत तप से सिंचित, आते काम हैं कर्म|
वृक्ष समान कर्म फल देते, समझो यह है मर्म||
श्लोक क्र.[ 97 ]
काव्यानुवाद ..डॉ.ओ.पी.व्यास
............................................................................
[ 96 ]'''नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही तुमको बान्म्बार है |...
भर्तृहरि नीति शतक काव्यानुवाद ...डॉ.ओ.पी व्यास
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नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है |
[ 1 ]
कर्म ने ब्रम्हा की नियुक्ति की, जैंसे कोई कुम्हार है||
बड़ा भाण्ड ब्रह्मांड बनाया, ब्रम्हा को उसमें बैठाया||
ब्रम्हा उसमें बैठे बैठे, स्रष्टि करें तैयार हैं|
नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है ||
[ 2 ]
भगवन विष्णु स्वयं संकट में, बार बार फंसते झंझट में||
आना पड़ता है धरती पर, लेते दश अवतार हैं |
नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है ||
[ 3 ]
महादेव शिव खप्पर ले कर, भिक्षा हेतु हो गये तत्पर ||
जिनके पास हैं श्री गंगा जी, गले नाग के हार हैं |
नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है ||
[ 4 ]
सूर्य सरीखे अति तेजस्वी, पाई परिचारक की पदवी ||
भ्रमण गगन में करना पड़ता, उनको बारम्बार है |
नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है ||
[ 4 ]
ब्रम्हा, विष्णु, शिव, सूर्य सरीखे, कर्मानुसार बर्तना सीखे ||
सभी करें अपने कार्यों को, सब अपने कर्मानुसार हैं |
नमस्कार हें कर्म तुम्हें ही, तुमको बारम्बार है ||[ 96 ]
.
काव्यानुवाद ....डॉ.ओ.पी. व्यास
........................................................................................
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