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27 फ़र॰ 2016

आप बीती -डॉ, ओ,पी.व्यास

              आप बीती
{15 /1 /2016 श्री मकर संक्रान्ति पर अचानक में बेहोश हो गया था, होश आने के बाद  मेने स्वय को अस्पताल में पाया, मुझे इंदौर ले जाया गया, ठीक होने पर मेरे मन के भाव प्रस्तुत हैं।  

वास्तव में होता नहीं, यहाँ पर टाइम पास,
 एस्ट्रोडरफ [ नकली घास ] लगी हुई कैसे खोदें घास । 
प्रात काल यहाँ पर हुआ, और सब कर रहे भजन, 
अभी अभी पी चाय है , और किया मंजन ।

11 अग॰ 2014

लड़का है इंदौर हमारा ...हास्य कविता ...डॉ.ओ.पी.व्यास

हास्य कविता ....[डॉ.ओ.पी.व्यास ]
कनाड़ा जाने से पूर्व ...

लड़का है इंदौर हमारा, लड़की रहे कनाड़ा है.। 
जाना कैसे होवे सम्भव, लगे बहुत सा भाड़ा है॥ 
लड़का है इंदौर हमारा, लड़की रहे कनाड़ा है। 
जाना कैसे होवे सम्भव, लगे बहुत सा भाड़ा है ॥ 
भारत में गरमी पडती है, वहां बहुत ही जाड़ा है। 
क़दम क़दम पर खतरा खतरा, बंधा हुआ यम पाड़ा है॥
अब तो जाना लगभग तय है, बांध लिया अब नाडा है। 
वहां पर नॉन वेज मिलता है, यहाँ पर वेज सिंघाड़ा है। 
वहां जिन्हें ब्राइड ग्रूम कहें हैं, यहाँ वो लाड़ी लाड़ा है॥
वहां पर जिम हैं हेल्थ बनाने, यहाँ मलखम्भ अखाडा है। 
यहाँ पर है बंगाल की खाड़ी, वहां हडसन का खाड़ा है॥ 
वहां पर पीने को हर किस्मी, यहाँ तुलसी का काढ़ा है। 
होगा दूध वहां पर गाढ़ा, पर प्रेम यहाँ पर गाढा है ॥ 
वहां पर गोरी भूरी मेमें, यहाँ पर रानी हाड़ा है। 
पर अब समय आया जाने का, बजने लगा नगाड़ा है ॥ 
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[डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.]


त्रिपति बालाजी यात्रा ...कविता में ...डॉ.ओ.पी.व्यास

त्रिपति बालाजी यात्रा ..[ डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र. ]
[ दक्षिण भारत के मन्दिरों में आंध्रप्रदेश में श्री त्रिपती बालाजी का भव्य और सुंदर मन्दिर है इस मन्दिर की भक्तों में बहुत आस्था और मान्यता है उस मन्दिर की सुंदर झांकी आपकी सेवा में पस्तुत है ....]

अति विशाल मंदिर तिरुपति का, भव्य और है अति सुंदर॥

स्वर्णिम शिखर, सुनहरे, सुंदर, मनहर छवि ,मूर्ति अंदर॥

बड़ी ,बड़ी गैलरियां विशाल, और अति कमाल के सुंदर कक्ष॥

सीढ़ीदार बैठकों की ,व्यवस्था, अब हम सब के ही , है समक्ष॥

भक्त जनों को ,प्रतीक्षा में, आता है , आनंद बहुत॥

बारम्बार ,प्रसाद को पाकर, पाते परमानन्द बहुत॥

कभी दूध , कभी चाय,भात है, कभी दूध , मीठा मिलता॥

कोई यात्री, ना घबराता, कोई ज़रा भी ना हिलता॥

कई, कई , घंटों के बाद , द्वार सभी हैं खुल जाते॥

तिरूपति स्वामी, भक्त जनों को, दर्शन को फिर बुलबाते॥

चलते हुए, असंख्य गली से, शीतल जल पीते , पीते॥

चलते ,जाते ,पंक्ति बद्ध सब, क्षण समान , घण्टे बीते॥

अब मिलने की घड़ी आ गई , जिसकी ,सब को आस है॥

प्रभु , अब भक्तों की, सीमा में , कोई ना जिनका ,व्यास है॥ 

और तभी, वह क्षण भी आया, प्रभु से साक्षात्कार हुआ॥ 

स्वप्न, संजोया गया जीवन का, लीजे, अब साकार हुआ॥

सभी, भक्त, निज व्यथा ,कथा को, प्रभु को, शीघ्र सूना देते॥ 

स्वीकृति , स्वामी, की ,मिल जाती , मानो , सभी मना लेते ॥ 

अब, सब के ,चेहरों की चिंता, सारी ही क़ाफूर हुई॥ 

सब ,थकान ,हुई दूर ,कामना, भक्त जनों ,की पूर हुई ॥ 

सुंदर , सुंदर ,कई हैं ,मन्दिर, एक से एक ,बने सुंदर॥

दर्शन से, जग जातीं खुशियाँ , हर जन के बाहर अंदर॥

योग ,आ गया ,प्रभु दर्शन का , इससे, बड़ा, क्या योग है॥ 

मानव, जीवन, के पाने का, क्या बढ़ कर ,उपयोग है॥ 

अब प्रसाद ,लाड़ू पाने की, घड़ी , शुभ घड़ी ,आई है॥ 

आप भी जल्दी पा लें ,भैय्या, “ व्यास “ ने जो निधि पाई है॥ 
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डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र. 20/4/2004रविवार ...

2 मई 2014

आते हैं याद वे दिन ...डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.

3.5.2014 शनिवार 
आते हैं याद वे दिन ...
[डॉ.ओ.पी.व्यास गुना  म.प्र. ] 


आते हैं याद वे दिन, जब  खाते  थे,  हम हलुआ और परांठा .
और आती थी जब बराई [गन्ना ] , हम चोंखते थे  सांटा ..
खाते थे डांट जब हम , अपने पिताजी की हम ,
खा लेते चलते फिरते, अम्मा का जब थे  चांटा। 
बिना जूतों के दौड़ते  थे ,रोते थे जोर से हम ,
अगर  लगता था  हमें  काँटा ..
कंकड़ और धाऊ पत्थर से,पैर बहुत छिलते  थे .
पर घावों को टिंचर आयोडीन के,स्वाद जब मिलते थे। 
पर एकाध बार में ही ,वे घाव ,सब भरते थे ..
 फिर  दूसरे घावों की तैय्यारी हम करते थे ..
चक्का घुमाने में भी कोई ,अपना नहीं था सानी .
 ऊधम बहुत करते थे ,आतीं थीं घर जब नानी ..
प्यारा हमारा बचपन, कितनी मस्ती से हमने काटा .
पुचकार चूम अम्मा ने कई बार हमको डाटा ..
पर  ,जब तक रहा वो बचपन  ,
  ऊधम को किया हमने ,  नहीं एक दिन भी टा टा ..
[ बचपन की यादें ...डॉ.ओ.पी. व्यास गुना म.प्र. ]  
           
       






13 जुल॰ 2013

कनाडा यात्रा के बीच ..मौसम

कनाडा यात्रा ... मौसम 
तीन माह सर्दी पड़ी, खूब पड़ा था शीत। 
                      धीरे धीरे सर्दी गई,  गई ठंड अब बीत। 
  बरफ गिरी कई बार थी, हुई कई बार बरसात। 
                      कहीं कोई दिखता ना था ,ना कोई पक्षी   ना आदम जात  कीड़े,मकोड़े गए थे, हाई बरनेशन में छुप। 
                     वृक्ष आदि पत्ते बिना, बैठे हुए थे दुक ॥
 फिर जैसे ही वसंत आई, सब में आई उमंग।
                    गायब बरफ होने लगी, बदल गए सब रंग ॥
फूल ,पात सब आ गए, बाहर आए जीव ।
                    पल में बदला, वातावरण, हो गए सभी सजीव ॥
जब स्प्रिंग [वसंत ऋतु ], की स्प्रिंग मिली,या औसम ने जंप ।
                   खुशीओं के छक्के लगे ,उखड़ गए स्टम्प ॥
 मेराइन लेंड, रीक्रिएशन सेंटर ,सब के खुल गए द्वार ।
                                    नए कार्यक्रम होने लगे, आई नई बहार॥
सड़कों की साइड के ऊपर अब लगे दौड़ने लोग।
                         साईकल भी चलने लगीं, मिला मोटर सायकल योग॥
 सिटी बसें भरने लगीं भरे,  पिकनिक स्पौट ।
                        फन सेंटर सब खुल गए ,अब खुशियाँ हुईं एलाट ॥
नियाग्रा फाल आने लगी, अब लोगों की भीड़ ।
                        पक्षी बाहर आ गए छोड़ छोड़ कर नीड़ ।
काली चिड़िया ,कबूतर और दिखीं गौरय्या ।
                       कोवे भी दिखने लगे, हंस [Goos ] आ गए भय्या ॥
आसमान अब भर गया चलीं पक्षिन की फौज ।
                         गरज ये है निकले सभी खूब मनाने मौज ॥
धीरे धीरे पकड़ गयी, तेजी अब तो धूप। 
                         पंखे भी चलने लगे,बदल गया सब रूप॥ 
रिपिस्टिक चलने लगीं, अब हुए क्रिकेट के गेम । 
                        कपड़े फेंक सब चल दिए, छोड़ छोड़ कर शेम॥ 
बास्केट बाल, जिम्नाशियम आदि का चला दौर । 
                         वर्णन लंबा होएगा,  अगर लिखेंगे और॥
 कु.अनन्या घुटने चलने लग गई ,लगी खोपड़ी फूट । 
                          खड़ी होने की जुगत में ,अब ना रही अटूट॥ 
नैनसी ,लकिया आदि बन गए उसके बहुत से  फ्रेंड । 
                         ऊधम इतना करने लग गई ,नहीं है जिसका एंड॥ 
जिसको देखो वही अब  , बन रहा उसका मित्र । 
                          हमने खूब बनाए वीडियो ,खींचे बहुत से चित्र॥ 
अर्णव भैया रख रहे, उसका  बहुत  हैं ध्यान। 
                         जय जय जय श्रीक़ृष्ण जी, जय जय शिव  हनुमान॥ 
श्री राम चंद्र जी रक्षा करें, करें प्रार्थना रोज़ । 
                         परमात्मा की कृपा से, खूब मनाएँ मौज॥ 
        डॉ .ओ .पी .व्यास नई सड़क गुना म.प्र .21/6/2011 मंगलवार /मोबाइल ...09425766913

7 जन॰ 2013

कनाडा यात्रा -2 -सी एन टॉवर .टोरोंटो-.डॉ. ओ.पी. व्यास...२२/५/२०११/

विश्व के सात आश्चर्यों मेँ एकसी॰ एन॰ टावर टोरेंटों कनाडा।
देखें -  वीडियो - आप भी इसका आनंद लें । 
  कनाडा-यात्रा- 1 आगे
  डॉ, ओ.पी. व्यास ब्राम्पटन ओंटारियो 
 २२/५/२०११//.  
ब्राम्पटन ओंटारियो कनाडा -
CN Tower Toronto.सी एन टॉवर .टोरोंटो.
 यह टॉवर वर्ल्ड का शायद सबसे ऊंचा टॉवर है।  हम दिन के ११ बजे ब्राम्पटन

कनाडा-यात्रा १६/५/२०११ .

१६/५/२०११ .
कनाडा यात्रा
डॉ, ओ.पी. व्यास ब्राम्पटन ओंटारियो कनाडा ...
.
   परसों एक पंजाबी परिवार से मिलने गये थे।  यह चंडीगढ़ के हैं,  खुदका ट्रक है, कनाडा , अमेरिका दोनों जगह चलाते हैं, काफी साल से यहाँ रह रहे हैं। उनसे पारिवारिक सम्बन्ध हैं। अच्छा बड़ा मकान है। बेस मेंट सहित ३मन्जिला है, मकान की सजावट , सफाई बहुत अच्छी है। 
खास बात यह है , यहाँ नोकर चाकर नहीं हैं, सब काम अपने हाथ से ही करना पड़ता है। बहुत अच्छा लगा!

6 जन॰ 2013

वसंती हवाएँ कविता ...कनाडा यात्रा के संस्मरण

Mon, 24 January, 2011 10:21:38 PM  Reply of mail 24/1/2011.Monday.-From: DrOP Vyas   
प्रिय सभी ,
समाचार प्राप्त हुए, आपके समाचार के अनुसार सौ .प्रेरणा कह रही हैं ...''... सौ. नित्या को भी कविता करना आ गयी है, क्योंकि आपने मौसम का वर्णन सुंदरता से किया है, ......
बसंती हवाएँ  चलने लगी हैं,
 मौसम खुशनुमा हो गया है ''
*वास्तव में जब हम हृदय से लिखते हैं ...वह काव्य है। संस्कृत में  ...'' रसात्मकम वाक्यम हि काव्यम '' ...
यहाँ आज तापक्रम -19 है । पर धूप निकलने से अच्छा लग रहा है । ...
इसी बात को खिदमत में यूं  अर्ज़ किया जा सकता है ... 
''आज बरफ है गिर रही चारों तरफ सफ़ेद । 
शायद ऐंसे ही मौसम में लिखे गए थे वेद ॥
ऋषी, मनीषी  और तपस्वी, गए थे पर्वत राज [हिमालय ] । 
 हम हैं खुश किस्मत वह मौसम, हम को मिल गया आज ॥ 
ऋषी, मनीषी, और तपस्वी करते वहाँ थे तप [वरशिप ]
 हम भी यहाँ हीटिंग सिस्टम में बैठे करते जप ॥
पढ़ें श्याम को रामायण, प्रात: सुनें भजन ।
 मानो हम सेवा निव्रत  [रिटायर्ड ],  बैठे लेते पेंशन॥
बहुत बहुत स्नेह हमारा पीहू, कूहू, देव । 

अगर पसंद आएँ कुछ बातें उन को कर लो सेव ॥''
...सभी को धन्यवाद । 
सोमवार 24 जनवरी 2011, समय प्रात: 11
 डॉ .ओ .पी.व्यास ब्रोंपटन कनाडा से ....

*Actually When we Write some thing, by heart (dil)  ,.it is Poetry. In सी . एन . टॉवर के पास चलती फिरती होटल टोरेन्टो कनाड़ा 

26 दिस॰ 2012

कु.अनन्या - उड़ना सीख रही है चिड़िया ।

कविता ..उड़ना सीख रही है चिड़िया ।

.[आयुष्मती कु.अनन्या]
10 - 1 - 2011 मंगलवार॥


उड़ना सीख रही है चिड़िया ।
चलना सीख रही है गुड़िया ॥
पंखों में ताक़त आनी है ।
सिखा रही उसको नानी है ॥
धूप …
कनाडा प्रकृति चित्रण ...[मार्च माह का हाल ] कविता

नोट -  [ कनाडा मेँ कपड़ों से शरीर को बिना ढके धूप मेँ निकालना खतरनाक होता हे।]

मृग मरीचिका जैसी धूप यह, चमक दार है निकली । 

मैंने सोचा बाहर घूमूँ, बरफ भी सारी पिघली ॥ [ 1 ]

मगर चला जब थोड़ा बाहर, हो कपड़ो में पैक ।

हाथ पैर सब ठंडे पड़ गए, लगे पैरों में ब्रेक ॥[2]

लगता था यदि ज्यादा घूमा, हो जाऊंगा सुन्न ।

वापिस घर में जल्दी आया, रहा इसी से टन्न ॥[3]

घरों में गरमी लगे है, लें खिड़की से धूप।

बाहर कम ही जाईए, वरना हों स्तूप ॥[4]

धोखा धूप ये दे रही, इसको समझो भाई ।

वरना बिस्तर में पड़े ,करोगे आई आई आई आई ॥
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बहुत  देर  खोया  रहा  मैं  आसमान  को  देख,                                                        मामूली  बदल  के  टुकड़ों  में दिया  दिल  को फेंक ॥[1]
    कल तो हलकी बरफ गिरी थी, फिर हुई अचानक बारिश   
 फिर ये आज सब किधर भाग गएक्या कहीं लगी सिफारिश॥[2]
और कहीं कुछ कम मिला क्या? गए वे  वहां  बरसने  
  नरम  गरम  मोसम कर  देतेसब लगते हैं हरसने।[3]
  फिर वे कहीं पर छिप जाते हैंसब लग जाते तरसने  
  फिर लो अचानक सूरज आयाहर कोई लगा सरसने।[4]
 हम को क्या मालूम, कोनयह पूरी करे व्यवस्था 
 कहाँ ? से  आतीं, ऊर्जा  देवीबदलें सभी अवस्था ॥[5]
 हम सब हैंअभिभूतबनाई कितनी ? सुन्दर  धरती।
इसे मिटाएँ तो प्रभु  सोचे , अजी  कैसी?  कर दी भरती॥[6]
 इस सुन्दर पृथ्वी पर हम सबकरें सुंदर ही काम ।
  जब  हम परमात्मा के पुत्र हैं। क्यों? बट्टा देंय पिता के नाम[7]
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बचपन की यादें

बचपन की यादें


आते हैं याद हमको बचपन के प्यारे दिन |


कितने खुशी भरे थे, थे कितने न्यारे दिन ॥


[ 1 ]


वो सीताफलों को खाना। सराय को वो जाना ।।


तालाब मैं नहाना॥ सुनना टिटहरी गाना ॥


सोन्धे ओर मोटे गुड के, सेवों का प्यारा स्वाद ।


आ जाता मुंह मैं पानी, आ जाते जब वो याद ॥


कंगूरे दार खंभे पै, वो छाछ का बिलोना ।


रबड़ी मलाई खाना ,कथरी का वो बिछोना ॥


सामने लगा हुआ , नीम का वो पेड़ ।


खाते निबोरिओ को बैठे , वहाँ पै ढेढ ॥


कहते हैं लोग जिनको ,कठिन और खारे दिन।


आते हैं याद हमको बचपन के प्यारे दिन।


कितने खुशी भरे थे, थे कितने न्यारे दिन॥


[ 2 ]


आता था जब दशहरा, चलती वहाँ थी तोप।


हाथी पै राजा बैठे, घोड़ों की गूँजें टाप॥


माला गले में पहिने, कुर्बानियों के बकरे।


बाजे तुरही का बजना , वो घूमते थे चकरे॥


अचरज भरे हुए थे, वे सब नटों के खेल।


भाटों की विरदावलियाँ, वो नाचतीं रखेल॥


मेहफिल सजीं हुई थीं, वे शानदार सब।


बैठे सजे धजे थे, वहाँ मानदार सब॥


कविता हमारी सुन कर, राजा का खुश वो होना।


जंगल में जाके आना, और लूट लाना सोना ॥


उन सुनहरे दिनों पै, हमने ये वारे दिन ॥


आते हैं याद हमको ,बचपन के प्यारे दिन।


कितने खुशी भरे थे, कितने न्यारे दिन ॥


[3]


एक म्यूजियम भी वहाँ था,पूरा सजा धजा था।


कमरा वो शेरों के चेहरों से,अटा पटा था ॥


शेरों और तेंदुओं की थीं वहाँ अनेक खालें ।


शेरों के मुख भयानक, उन में भरे मसाले ॥


सुंदर और मखमली कालीन वहाँ बिछे थे ।


दीवारों पर अनेकों, हथियार वहाँ टंगे थे ॥

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भृतहरि नीति शतक का काव्यानुवाद