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12 मई 2019
1 जन॰ 2018
331 / नया साल आया , नया साल आया | पुराने गमों को कहीं डाल आया || एक बेहतरीन उर्दू रचना ..डॉ.ओ.पी.व्यास
331 . नया साल आया | नया साल आया ||
पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
एक बेहतरीन उर्दू रचना ..
डॉ. ओ.पी.व्यास
नया साल आया | नया साल आया |
पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
[ 1 ]
गुलशन के गुंचों पे आईं बहारें |
ख़ुशी की सबाएं ,सुख की फुहारें ||
जिनके दमों से मिला है ये मंज़र ,
हमें आज उनका , फिर ख़याल आया ||
नया साल आया ..
पुराने गमों को ...
[ 2 ]
वो भगतसिंह अशफाक़ को हम ना भूलें |
जो फांसी के फंदों पे हंस हंस के झूले ||
अमर सब शहीदों को, हम याद कर लें ,
डरे ना कभी जब महा काल आया |
नया साल आया ...
पुराने गमों को ..
[ 3 ]
वो झांसी की रानी को याद कर लें |
गांधी , जवाहर को उर में धर लें ||
जो लाला लाजपत ने , जो लज्जा बचाई ,
शमा हिन्द पे जलने जो , तिलक बाल आया |
नया साल आया .
पुराने गमों को ..
[ 4 ]
ये तिकडम ये चालें , करें ज्यादा ना हम |
शहीदों की रूहों को ,दें ज्यादा ना गम ||
यहीं पे , कहीं पे वो सो रहे हैं ,
यही सब जताने को भू चाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 5 ]
तरक्की तो हमने , यकीनन है कर ली |
गरीबों की सुधि तो नहीं आज तक ली ||
अब भी है मौक़ा उन्हें गले से लगा लें ,
दिलों में ये फिर से उबाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 6 ]
ये बार बार बापू की कसमों को खा के |
वे कोमी तराने कई कई बार गा के ||
ला पाए क्या हम , सही में आज़ादी ,
खड़ा पूंछता, दर पे ,वो कंगाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 7 ]
वो झन झन झनन , झन झन झनन झन |
वो टूटीं गुलानी की जंजीरें , खनन खन ||
दिखाने हमें फिर से , ये साल आया |
नया साल आया , नया साल आया |
पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
नोट .. ये उर्दू की बहुत खूबसूरत नज़्म [ कविता ] है उम्मीद है आपको पसंद तो आयेगी ही ,हमें सोचने को भी मज़बूर कर देगी | शुक्रिया ..जय हिन्द | नया साल मुबारक | हैपी न्यू ईअर |...
यह कविता लग भग २५ साल पहिले लिखी थी| मगर आज भी प्रासंगिक है ..
डॉ.ओ.पी.व्यास
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पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
एक बेहतरीन उर्दू रचना ..
डॉ. ओ.पी.व्यास
नया साल आया | नया साल आया |
पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
[ 1 ]
गुलशन के गुंचों पे आईं बहारें |
ख़ुशी की सबाएं ,सुख की फुहारें ||
जिनके दमों से मिला है ये मंज़र ,
हमें आज उनका , फिर ख़याल आया ||
नया साल आया ..
पुराने गमों को ...
[ 2 ]
वो भगतसिंह अशफाक़ को हम ना भूलें |
जो फांसी के फंदों पे हंस हंस के झूले ||
अमर सब शहीदों को, हम याद कर लें ,
डरे ना कभी जब महा काल आया |
नया साल आया ...
पुराने गमों को ..
[ 3 ]
वो झांसी की रानी को याद कर लें |
गांधी , जवाहर को उर में धर लें ||
जो लाला लाजपत ने , जो लज्जा बचाई ,
शमा हिन्द पे जलने जो , तिलक बाल आया |
नया साल आया .
पुराने गमों को ..
[ 4 ]
ये तिकडम ये चालें , करें ज्यादा ना हम |
शहीदों की रूहों को ,दें ज्यादा ना गम ||
यहीं पे , कहीं पे वो सो रहे हैं ,
यही सब जताने को भू चाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 5 ]
तरक्की तो हमने , यकीनन है कर ली |
गरीबों की सुधि तो नहीं आज तक ली ||
अब भी है मौक़ा उन्हें गले से लगा लें ,
दिलों में ये फिर से उबाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 6 ]
ये बार बार बापू की कसमों को खा के |
वे कोमी तराने कई कई बार गा के ||
ला पाए क्या हम , सही में आज़ादी ,
खड़ा पूंछता, दर पे ,वो कंगाल आया |
नया साल आया ..
पुराने गमों को ..
[ 7 ]
वो झन झन झनन , झन झन झनन झन |
वो टूटीं गुलानी की जंजीरें , खनन खन ||
दिखाने हमें फिर से , ये साल आया |
नया साल आया , नया साल आया |
पुराने गमों को कहीं डाल आया ||
नोट .. ये उर्दू की बहुत खूबसूरत नज़्म [ कविता ] है उम्मीद है आपको पसंद तो आयेगी ही ,हमें सोचने को भी मज़बूर कर देगी | शुक्रिया ..जय हिन्द | नया साल मुबारक | हैपी न्यू ईअर |...
यह कविता लग भग २५ साल पहिले लिखी थी| मगर आज भी प्रासंगिक है ..
डॉ.ओ.पी.व्यास
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17 मार्च 2014
होली ....डॉ . ओ.पी .व्यास गुना म. प्र.
होली
हैं वे किसी के और किसी के साथ में होली।
शकल भोली है ,झोली में मगर है भंग की गोली।
अजब है चाल में मस्ती ,अजी हर बात में होली ॥
जो कल तक मिल नहीं सकते थे दिन के उजाले में।
वो सुनते हैं मनाते हैं आजकल रात में होली॥
वो जीते हैं होली को ,वो पीते हैं होली को ।
घुसी नस नस में है होली ,अजी हर जात में होली ॥
जो रूठे थे जनम भर के ,जो बैठे थे कसम करके।
गिले शिकवे गये हैं भूल , आई मुस्कात में होली॥
अमलताशों पे है होली ,पलाशों पर भी है होली.
फूले झूमते कचनार हैं ,है अब हर पात में होली॥
करें है आस , निकले फ़ांस ,रही जो आंस जन्मों से ।
मिटे वो प्यास ,कहता ''व्यास '' हो हर गात में होली॥
26 फ़र॰ 2014
गज़ल ...हम खुद परस्त कितने ...डॉ .ओ .पी . व्यास
गजल
हम खुद परस्त कितने दुनियाँ में हो रहे हैं ।
हम चाहते हैं दुनियाँ सजदा करे हमारा ,
ओहदों को अपने अपनी पीठों पै ढो रहे हैं ॥
दुनिया ने ली अँगड़ाई और जाग चुकी कब से ,
हम ख़्वाब की दुनियाँ में सपने सँजो रहे हैं ॥
बाग ए वफा की खाक कर दे खाद चमन में ,
हम बेवफाइओ के काँटों को बो रहे हैं ॥
जिनसे हमें सुकूँ की उम्मीद थी थोड़ी सी ,
देखा करीब से तो वे खुद ही रो रहे हैं ॥
उम्मीद '' व्यास '' उनसे किस तरह हो भंवर में ,
साहिल पै ही जो किश्ती खुद की डुबो रहे हैं ॥
डॉ .ओ .पी .व्यास गुना म.प्र.
3 मार्च 2012
गजल -शहीदों के नाम
गजल
शहीदों के नाम
अशफाक आरज़ू को पूरी ना कर सके हम;
ख़ाक ए वतन कफ़न में तेरे ना धर सके हम!
जो जला है चिराग़ उस का निशां बाक़ी है;
जमीं वही है,और वही आसमां बाक़ी है!
रहा ना कुछ भी तो बाक़ी है,अब जमाने में,
जाम तो खाली हुआ दर्द ए *निहाँ बाक़ी है!
डॉ. ओ. पी. व्यास ..नई सडक गुना म.प्र. भारत
-ब्राम्पटन ओंटारियो कनाडा से दि.- ६/५/२०११
*[छिपा हुआ दर्द ]
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