[ 359 ]
[ श्लोक क्र . 48 ]
गति तुरंग सी चंचल जिनकी ,
ऐंसे जिनके चित्त |
गति तुरंग सी चंचल जिन की ,
ऐंसे जिनके चित्त |
ऐंसे राजाओं की सेवा ,
क्यों करते हो मित्र ||
मगर हमारी इच्छाएं हैं ,
सब की सब स्थूल |
उच्च पदों की अभिलाषा से ,
करते हम यह भूल ||
हें मित्र , हरण करती है जरा [ वृद्धावस्था ] ,
सुंदर से इस तन को |
और मृत्यु पल में हर लेती ,
क्षण भंगुर जीवन को ||
अतह मित्र , जो पुरुष विवेकी ,
मार्ग ना तप अतिरिक्त |
यह ही मार्ग मात्र श्रेयस्कर ,
तप बिन सब है रिक्त ||
श्लोक क्र . [ 48 ]
भर्तृहरि वैराग्य शतक ,
काव्य भावानुवाद
डॉ.ओ.पी.व्यास
9 2 1997 रविवार
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[ श्लोक क्र . 48 ]
गति तुरंग सी चंचल जिनकी ,
ऐंसे जिनके चित्त |
गति तुरंग सी चंचल जिन की ,
ऐंसे जिनके चित्त |
ऐंसे राजाओं की सेवा ,
क्यों करते हो मित्र ||
मगर हमारी इच्छाएं हैं ,
सब की सब स्थूल |
उच्च पदों की अभिलाषा से ,
करते हम यह भूल ||
हें मित्र , हरण करती है जरा [ वृद्धावस्था ] ,
सुंदर से इस तन को |
और मृत्यु पल में हर लेती ,
क्षण भंगुर जीवन को ||
अतह मित्र , जो पुरुष विवेकी ,
मार्ग ना तप अतिरिक्त |
यह ही मार्ग मात्र श्रेयस्कर ,
तप बिन सब है रिक्त ||
श्लोक क्र . [ 48 ]
भर्तृहरि वैराग्य शतक ,
काव्य भावानुवाद
डॉ.ओ.पी.व्यास
9 2 1997 रविवार
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