पृष्ठ

17 मार्च 2014

होली ....डॉ . ओ.पी .व्यास गुना म. प्र.

होली 
हैं वे  किसी के और किसी के  साथ  में  होली। 
मनाएं प्यार से मनुहार से , हर हाथ में होली॥ 
शकल भोली है ,झोली में मगर है  भंग की गोली। 
अजब है चाल में मस्ती ,अजी हर बात में होली ॥ 
जो कल तक मिल नहीं सकते थे दिन के उजाले में। 
वो सुनते हैं मनाते हैं आजकल   रात में होली॥ 
वो जीते हैं होली को ,वो पीते हैं होली को । 
घुसी नस नस में है होली ,अजी हर जात में होली ॥ 
जो रूठे थे जनम भर के ,जो बैठे थे कसम करके। 
गिले शिकवे गये हैं भूल , आई  मुस्कात में होली॥ 
अमलताशों पे  है होली  ,पलाशों पर भी है  होली. 
फूले झूमते कचनार हैं ,है अब हर पात में होली॥ 
करें है आस , निकले फ़ांस ,रही जो आंस जन्मों से । 
मिटे वो प्यास ,कहता ''व्यास '' हो हर गात में होली॥ 

भृतहरि नीति शतक का काव्यानुवाद